रायपुर:
छत्तीसगढ़ सरकार के कृषि आधारित आजीविका संवर्धन के प्रयासों के अंतर्गत प्रदेश में सुगंधित फसलों (Aromatic Plants) की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रही है। राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप जी के कुशल मार्गदर्शन में ‘छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड’ द्वारा किसानों को पारंपरिक खेती के स्थान पर कम लागत और अधिक लाभ वाली औषधीय व सुगंधित फसलों से जोड़ा जा रहा है।
वन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देशों के अनुरूप बोर्ड द्वारा किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस पहल से बंजर एवं कम उपजाऊ भूमि का बेहतर उपयोग हो रहा है और स्व-सहायता समूहों तथा कृषक समूहों की आय में भारी वृद्धि हो रही है।
स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण: 13 आसवन इकाइयां स्थापित:
किसानों की सुविधा और उत्पाद के मूल्य संवर्धन के लिए मनेन्द्रगढ़-भरतपुर-चिरमिरी, कोरिया, सूरजपुर, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, कोरबा, बिलासपुर, महासमुंद और गरियाबंद जिलों में कुल 13 क्षेत्र आसवन इकाइयों (Field Distillation Units) की स्थापना की गई है। इनसे किसान अपने खेत के पास ही सुगंधित पौधों से तेल (Essential Oil) निकाल रहे हैं, जिससे परिवहन का खर्च बचा है और सीधे शुद्ध तेल बेचकर अधिक मुनाफा मिल रहा है।
प्रमुख फसलें और रकबा
लेमनग्रास: लगभग 250 एकड़
खस (वेटिवर): 127 एकड़
अन्य फसलें (प्रायोगिक): सिट्रोनेला (29 एकड़), पचौली (8 एकड़) तथा पामारोजा
जोखिम कम, मांग अधिक:
पारंपरिक फसलों की तुलना में लेमनग्रास, खस और पामारोजा जैसी फसलों में आवारा मवेशियों से नुकसान और मौसम की अनिश्चितता का खतरा न के बराबर रहता है। बाजार में सुगंधित तेलों की मांग लगातार बनी रहने से किसानों को उनकी उपज का बेहतर और सुनिश्चित मूल्य मिल रहा है।
वन मंत्री श्री केदार कश्यप के नेतृत्व में जारी यह नवाचार न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर पैदा कर रहा है, बल्कि छत्तीसगढ़ में “सुगंधित समृद्धि” के एक नए युग की शुरुआत कर रहा है।


